Topics



सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास एवं पतन के मुख्य कारण

सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास एवं पतन के मुख्य कारण: (History of Indus Valley Civilization in Hindi)
सिंधु घाटी सभ्यता:
सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक सभ्यता है। यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। आज से लगभग 76 वर्ष पूर्व पाकिस्तान के ‘पश्चिमी पंजाब प्रांत’ के ‘माण्टगोमरी ज़िले’ में स्थित ‘हरियाणा’ के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों के निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हें तब हुआ जब 1856 ई. में ‘जॉन विलियम ब्रन्टम’ ने कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।
सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कैसे हुई?
इस अज्ञात सभ्यता की खोज का श्रेय ‘रायबहादुर दयाराम साहनी’ को जाता है। उन्होंने ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक ‘सर जॉन मार्शल’ के निर्देशन में 1921 में इस स्थान की खुदाई करवायी। लगभग एक वर्ष बाद 1922 में ‘श्री राखल दास बनर्जी’ के नेतृत्व में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के ‘लरकाना’ ज़िले के मोहनजोदाड़ो में स्थित एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के समय एक और स्थान का पता चला। इस नवीनतम स्थान के प्रकाश में आने क उपरान्त यह मान लिया गया कि संभवतः यह सभ्यता सिंधु नदी की घाटी तक ही सीमित है, अतः इस सभ्यता का नाम ‘सिधु घाटी की सभ्यता‘ (Indus Valley Civilization) रखा गया। सबसे पहले 1927 में ‘हड़प्पा’ नामक स्थल पर उत्खनन होने के कारण ‘सिन्धु सभ्यता’ का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ पड़ा। पर कालान्तर में ‘पिग्गट’ ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों को ‘एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां‘ बतलाया।

विशेष इमारतें:
सिंधु घाटी प्रदेश में हुई खुदाई कुछ महत्त्वपूर्ण ध्वंसावशेषों के प्रमाण मिले हैं। हड़प्पा की खुदाई में मिले अवशेषों में महत्त्वपूर्ण थे –
  • दुर्ग
  • रक्षा-प्राचीर
  • निवासगृह
  • चबूतरे
  • अन्नागार आदि।
सभ्यता का विस्तार:
अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के भागों में पाये जा चुके हैं। इस सभ्यता का फैलाव उत्तर में ‘जम्मू’ के ‘मांदा’ से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने ‘भगतराव’ तक और पश्चिमी में ‘मकरान’ समुद्र तट पर ‘सुत्कागेनडोर’ से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ तक है। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल ‘सुत्कागेनडोर’, पूर्वी पुरास्थल ‘आलमगीर’, उत्तरी पुरास्थल ‘मांडा’ तथा दक्षिणी पुरास्थल ‘दायमाबाद’ है। लगभग त्रिभुजाकार वाला यह भाग कुल क़रीब 12,99,600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सिन्धु सभ्यता का विस्तार का पूर्व से पश्चिमी तक 1600 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 1400 किलोमीटर था। इस प्रकार सिंधु सभ्यता समकालीन मिस्र या ‘सुमेरियन सभ्यता’ से अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैली थी।
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के मुख्य कारण:
  • पारिस्थितिक असंतुलन: फेयर सर्विस का मत,
  • वर्धित शुष्कता और धग्गर का सूख जाना: डी.पी. अग्रवाल, सूद और अमलानन्द घोष का मत,
  • नदी का मार्ग परिवर्तन: इस विचार के जनक माधोस्वरूप वत्स हैं। डल्स महोदय का मानना है कि धग्गर नदी के मार्ग बदलने का कारण ही कालीबंगा का पतन हुआ है। लेस्ब्रिक का भी यही मानना है।
  • बाढ़: मोहनजोदड़ो से बाढ़ के चिह्न स्पष्ट होते हैं। मैके महोदय का मानना है कि चाँहुदड़ो भी बाढ़ के कारण समाप्त हुआ, जबकि एस.आर. राव का मानना है कि लोथल एवं भगवतराव में दो बार भीषण बाढ़ आयी।
  • एक-दूसरे प्रकार का जल प्लावन: मोहनजोदडो, आमरी आदि स्थलों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता में एक दूसरे प्रकार का जल प्लावन भी हुआ है। कुछ स्थलों से रुके जल प्राप्त होते हैं। इस विचार के प्रतिपादक हैं-एम.आर. साहनी। एक अमेरिकी जल वैज्ञानिक आर.एल. राइक्स भी इस मत की पुष्टि करते हैं और यह कहते हैं कि संभवत: भूकंप के कारण ऐसा हुआ।
  • बाह्य आक्रमण: 1934 में गार्डेन चाइल्ड ने आर्यों के आक्रमण का मुद्दा उठाया और मार्टीमर व्हीलर ने 1946 ई. में इस मत की पुष्टि की। इस मत के पक्ष में निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं। बलूचिस्तान के नाल और डाबरकोट आदि क्षेत्रों से अग्निकांड के साक्ष्य मिलते हैं। मोहनजोदड़ो से बच्चे, स्त्रियों और पुरुषों के कंकाल प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में हरियूपिया शब्द प्रयुक्त हुआ है, इसकी पहचान आधुनिक हड़प्पा के रूप में हुई। इन्द्र को पुरंदर अर्थात् किलों को तोड़ने वाला कहा गया है।
विभिन्न विद्धानों द्वारा सिंधु सभ्यता का काल निर्धारण:
कालविद्धान
3,500 – 2,700 ई.पू.माधोस्वरूप वत्स
3,250 – 2,750 ई.पू.जॉन मार्शल
2,900 – 1,900 ई.पू.डेल्स
2,800 – 1,500 ई.पू. .अर्नेस्ट मैके
2,500 – 1,500 ई.पू.मार्टीमर ह्यीलर
2,350 – 1,700 ई.पू.सी.जे. गैड
2,350 – 1,750 ई.पू.डी.पी. अग्रवाल
2,000 – 1,500 ई.पू.फेयर सर्विस
हड़प्पा सभ्यता में आयात होने वाली वस्तुएं:
वस्तुएंस्थल (प्रदेश)
टिनअफगानिस्तान और ईरान से
चांदीअफगानिस्तान और ईरान से
सीसाअफगानिस्तान, राजस्थान और ईरान से
सेल खड़ीगुजरात, राजस्थान तथा बलूचिस्तान से
सोनाईरान से
तांबाबलूचिस्तान और राजस्थान के खेतड़ी से
लाजवर्द मणिमेसोपोटामिया
सिन्धु सभ्यता से सम्बंधित महत्वपूर्ण वस्तुएं:
महत्वपूर्ण वस्तुएंप्राप्ति स्थल
तांबे का पैमानाहड़प्पा
सबसे बड़ी ईंटमोहनजोदड़ो
केश प्रसाधन (कंघी)हड़प्पा
वक्राकार ईंटेंचन्हूदड़ो
जुटे खेत के साक्ष्यकालीबंगा
मक्का बनाने का कारखानाचन्हूदड़ो, लोथल
फारस की मुद्रालोथल
बिल्ली के पैरों के अंकन वाली ईंटेचन्हूदड़ो
युगल शवाधनलोथल
मिटटी का हलबनवाली
चालाक लोमड़ी के अंकन वाली मुहरलोथल
घोड़े की अस्थियांसुरकोटदा
हाथी दांत का पैमानालोथल
आटा पिसने की चक्कीलोथल
ममी के प्रमाणलोथल
चावल के साक्ष्यलोथल, रंगपुर
सीप से बना पैमानामोहनजोदड़ों
कांसे से बनी नर्तकी की प्रतिमामोहनजोदड़ों
हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थल:
पुरास्थलस्थान
हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थलसत्कागेन्डोर (बलूचिस्तान)
सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थलआलमगीरपुर (मेरठ)
सर्वाधिक उत्तर पूरास्थलमांडा (जम्मू कश्मीर)
सर्वाधिक दक्षिणी पुरास्थल
दायमाबाद (महाराष्ट्र)


Comments: Facebook

Comments: Google+

Comments: DISQUS

MOBILE TEST by GOOGLE launch VALIDATE AMP launch